आस्था के साथ, सच्चे मन, श्रद्धा व विश्वास से मेले में तीन दिन घी का दीपक जलाने से मनोकामना पूर्ण होती है

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खेड़ा मस्तान का हनुमान मेलाः एक परिचय

आपने बहुत से मेलों का नाम सुना होगा परन्तु "विशाल हनुमान मेला' का नाम न सुना होगा। “विशाल हनुमान मेला' नाम का यह पहला मेला है जो मुजफ्फर नगर शहर से लगभग 45 किमी दूर बुढ़ाना शामली रोड पर स्थित ग्राम खेड़ा मस्तान के हनुमान मंदिर पर लगता है । सामान्यतः यह फरवरी माह में होता है।
आप अवश्य यह जानना चाहेगं कि यह मेला खेड़ा मस्तान गाँव में "विशाल हनुमान मेला" के नाम से कैसे प्रारम्भ हुआ, प्रस्तुत है इसका रोचक वृतान्त परम पूज्यनीय ब्रम्हलीन श्री रवि नारायण मिश्र (इलाहाबाद वाले जो हनुमान मंदिर खेड़ा मस्तान व “विशाल हनुमान मेला' खेड़ा मस्तान, मुजफ्फर नगर के संस्थापक थें) की लेखनी -

“हनुमान मेला खेड़ा मस्तान मुजफ्फर नगर का यात्रा वृतान्त” मैं (रवि नारायण मिश्र) मूलरूप से गाँव नीवाँ, इलाहाबाद का रहने वाला हूँ। वर्ष 1976 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र विषय में एम० ए० प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के उपरान्त 1977 में लोकसवेळा आयोग, इलाहाबाद से सरकारी सेवा मे ं चयन हुआ। 36 सप्ताह के प्रशिक्षण के उपरान्त मेरी नियुक्ति प्रबन्ध निदेशक के पद पर किसान सेवा सहकारी समिति लिमिटेड, खेड़ा मस्तान मुजफ्फर नगर उ0 प्र0 में प्रतिनियुक्ति पर वर्ष 1978 मे कर दी गयी। अक्टूबर 1978 में मैंने उक्त समिति में योगदान किया तथा जुलाई 1984 तक यहाँ कार्यरत रहा।
खेड़ा मस्तान क्षेत्र की भाषा पपू रूप से अक्खड़ थी परन्तु यहाँ के लोगों में अपार प्रेम व अपनत्व था। इस बीच सब कुछ सामान्य चल रहा था कि सितम्बर 1981 में एक घटना घटी। मैं प्रतिदिन की तरह अपने कार्यालय में कार्यालय अवधि से पहले पहुँच कर एक पुस्तक पढ़ रहा था, उसी समय गाँव के कुछ नवयुवक घूमते हुए मेरे पास आये और मुझसे पूछने लगे:- (उनकी और मेरी वार्तालाप के अंश नीचे हैं)

प्रश्न- बाबू जी तू के पढ़ रहा है?

उत्तर-सुन्दर काण्ड।

प्रश्न - सुन्दर काण्ड के है?

उत्तर- रामचरित मानस का एक काण्ड है

प्रश्न - रामचरित मानस के है ?

उत्तर- गोस्वामी तुलसी दास जी ने जो मोटी पुस्तक लिखी है।

प्रश्न - तुलसीदास के राच (कौन) है?

उत्तर— अच्छा आप लोग आज जाइये और हम आपको बाद में बतायेंगे कि तुलसी दास कौन हैं ।

मैं सोचने लगा कि क्या आज भी हमारे देश में एसे गाँव हैं जहाँ शिक्षा का इतना अभाव है कि लोग रामचरित मानस व तुलसी दास को नहीं जानते। मेरा मन मुझे बार-बार धिक्कारने लगा कि तीर्थराज प्रयाग में जन्म लेना, वहाँ का निवासी होना, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन करना, ग्रामवायििो के उत्थान के लिए सरकार द्वारा एक अधिकारी के पद पर खेड़ा मस्तान भेजा जाना सब बेकार है। यदि मैं इन्हे यह जानकारी न करा सका कि रामचरित मानस व तुलसी दास कौन है? मैं कई दिनों तक इसी बात को सोचता रहा कि मुझे अब क्या करना चाहिए। बहुत विचार के बाद यह निश्चित किया कि दशहरे के अवकाश पर गाँव में रामचरित मानस का अखण्ड पाठ कराया जाय परन्तु न तो वहाँ कोई पढ़ने वाला था न रामचरित मानस की । अतः मैंने अपने मिलने वालों को पत्र लिखकर पुस्तक के साथ रूड़की, पुस्तक थी बिजनौर आदि स्थानो से 10-15 लोगों को बुलाकर पाठ प्रारम्भ करवाया। गाँव के लोगो ने मुझसे पछूळा बाबू जी क्या बाँच (चन्दा) दे दिया जाय। मैंने कहा आपको बाँच देने की जरूरत नहीं है। मैं अपने वते न से जो कर सकता हूँ करूँगा। अन्ततः बड़ी धूमधाम से चौबीस घण्टे का अखण्ड पाठ प्रारम्भ हुआ। गाँव मे चारों तरफ कानाफूँसी होने लगी कि यह कौन सी पूजा है कि कल से प्रारम्भ हुई और आज तक समाप्त नहीं हुई। इस आयोजन में गाँव वालों ने खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद प्रसाद वितरण हुआ । प्रसाद प्राप्त करके अधिकांश लोग वहाँ से चले गये फिर भी गाँव के कुछ प्रतिष्ठित लोग जैसे श्री बलबीर सिंह (पूर्व प्रधान जी), उनके भतीजे श्री इन्द्रपाल सिंह, श्री रणवीर सिंह (प्रधान जी ), चौधरी बृजपाल सिंह मलिक (लम्बरदार), श्री जयपाल सिहं, श्री माँगे सिंह, श्री इन्द्रपाल सिंह मुखिया आदि महानुभाव वहाँ बैठे रह गये थे। मैंने लोगों से कहा कि जरा गिन कर बताइये कि आरती में कितना पैसा आया । श्री महाबीर सिंह पुत्र श्री हरी सिंह ने गिनकर बताया कि बाबू जी आरती मे एक सौ तिरपन रूपया छियालिस पैसा आया है। मैंने वहाँ उपस्थित लोगों से पूछा, बताइये इन पैसों का क्या किया जाय। लोगों ने उल्टे मुझसे यह सवाल कर दिया कि आप ही बताइये इस पैसे का क्या किया जाय? आप-आप में मेरे मुख से निकला कि यह पैसा किसी ब्राह्मण को मिलना चाहिए। तब लोगों ने कहा कि आप से अच्छा ब्राह्मण यहाँ कौन है, आप रख लीजिए।

इसमें पूछने की क्या बात है। मैंने कहा, रखना कोई बुरी बात नहीं है परन्तु मेरे रखने से आप लोग सोचेगं कि पैसा कमाने के लिए इतना नाटक किया गया । मेरी समझ से इसे किसी अच्छे कार्य में लगाया जाय। आप लोग बताइये कि इसे किस काम में लगा दिया जाय। गाँव वालो ने कहा अच्छा रख दीजिए, जब गाँव में नाली / खड़ंजा लगेगा तो उसमें लगा दिया जायेगा। मैंने कहा चाहे नाली में लगाओ चाहे खड़ंजा परन्तु कल से कार्य प्रारम्भ करा दीजिए। लोग हँसने लगे और कहा कि इतने कम पैसे में नाली खड़ंजा नहीं बन सकता है। अतः मैंने प्रस्ताव रखा कि यह सामने जो कुआँ है (इसे गाँव वालो ने कूड़ा-करकट डालकर पाट दिया था) इस कुआँ की सफाई करा दी जाये। लोगो ने मेरे प्रस्ताव को स्वीकार किया । अगले दिन सुबह से कुआँ की सफाई का कार्यक्रम बनाया गया ।

पाँच-सात रात में जब मैं सो गया तो स्वप्न में सफेद बाल वाले बूढ़े श्री हनुमान जी की पाँच - सेकड के लिए एक झलक दिखायी दी जिसमें उन्होंने कहा बनवाता क्यो नहीं, बनवाता क्यों नहीं। यद्यपि मैंने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अगले दिन दिनाँक 31.10.1981 को प्रातः 7 बजे से कुआँ की सफाई का कार्य प्रारम्भ हुआ। गाँव वाले सफाई कार्य मे जुट गये। लगभग तीन - चार फुट जब खुदाई हुई तो वहाँ पर सोने की एक झुमकी (बाली) प्राप्त हुई। यह बाली गाँव के सुभाष सिंह पुत्र श्री देवी सिंह को मिली। उसने ईमानदारी से मुझे लाकर दिया। इस बाली को हमने बचे ने हेतु गाँव के ही श्री महाबीर सिंह व ऋषीपाल मास्टर जी को शामली भेजा। उन लोगों ने शाम के समय लगभग 5:30 बजे वापस आकर कहा कि बाबू जी बाली 440 रूपये मे बिक गयी और उन्होनं बिक्री का धन मुझे दे दिया। मेरे पास अब लगभग 600 रूपये इकट्ठा हो गया था। उस समय वहाँ गाँव के कई लोग बैठे थे। उन दिनों गाँव मे लगभग 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 4.50 प्रतिशत मुसलमान भाई तथा 0.50 प्रतिशत ईसाई भाई रहते थे। जो मुसलमान भाई थे वे भी कृषक, मजदूर व कारीगर आदि थे परन्तु उन लोगों में अपने धर्म के प्रति इतना लगाव था कि गाँव में एक मस्जिद बनवा रखी थी, ईसाई भाइयो ने एक गिरजाघर बनवा रखा था लेकिन गाँव में कोई मंदिर नही था। मुसलमान भाई उस समय अपनी मस्जिद को तोड़कर उसका विस्तार कर रहे थे। गाँव मे बहुत एकता थी । गाँव के हिन्दू भाई भी मस्जिद बनने के लिए दान देते थे। मेरे मन मे एकाएक यह बात आयी कि गाँव मे कोई मंदिर का न होना भी तुलसी दास या रामायण आदि का न जानने का एक कारण है। अतः मेरे मुख से एकाएक निकला कि यदि आप लोग अब थोड़ा-थोड़ा बाँच (चन्दा) दें तो इसी कुआँ के पास एक छोटा सा मंदिर भी बन जाय। कुआँ के पास ग्राम समाज की कुछ जमीन पड़ी हुई थी। जिस पर गाँव के लोग कुरणी (गोबर) एकत्रित करके अपना कब्जा कर रहे थे और आपस मे लड़ने के लिए तैयार थे। मैंने कहा यहाँ मंदिर बनने से विवाद भी समाप्त हो जायेगा और मंदिर भी बन जायेगा। मंदिर बनवाने का प्रस्ताव सभी लोगो को बहुत अच्छा लगा। मेरे इस प्रस्ताव पर गाँव के लोगो ने सवाल कर दिया कि बताइये क्या बाँच दे दिया जाय। मैंने कहा कि ईमानदारी से जिस व्यक्ति के पास जितना बीघा खेत हो उतना रूपया दे दीजिए। यदि पाँच बीघा हो तो पाँच रूपये और सत्तर बीघा हो तो सत्तर रूपये (वहाँ पर सात बिस्वा का एक बीघा होता है) । गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती ही है। गाँव वालों ने तुरन्त उसी गोधूलिया के समय अपने-अपने हिस्से का दान घर से लाकर दिया और देखते-देखते लगभग चौदह सो रूपये एकत्रित हो गया। फिर क्या था मेरी हिम्मत बढ़ी और मन मे आया कि जब प० मदन मोहन मालवीय एक–एक रूपये एकत्र करके काशी का विशाल विश्वविद्यालय बनवा सकते हैं तो मुझ भी दान माँगने मे कोई शर्म नहीं करनी चाहिए। यह एक अच्छा और सार्वजनिक कार्य है। हम कोई अपने लिए दान नहीं माँग रहे हैं । अतः सारी हिचक खत्म करके मैं इस कार्य में पूरे मनोयोग से जुट गया। एक-एक, दो - दो रूपये दान माँगने लगा। प्रतिदिन प्रातः पाँच बजे से नौ बजे तक तथा सायं काल छः बजे से दस बजे तक गाँव वालो से दान माँगता तथा उनके साथ श्रमदान करता। आस-पास के भट्टा वालों से थोड़ा-थोड़ा ईंट भी दान मे माँगा । चौधरी जयपाल सिंह मलिक पुत्र स्व0 श्याम सिंह मलिक ने शुभ मुहूर्त मे पाँच फावड़ा मारकर कार्य को प्रारम्भ किया । गाँव का एक मिस्त्री बुद्धू बाड़ी तथा कुछ दिन तक कीरत पाल बाड़ी मंदिर बनाने का काम किया। इस कार्य हेतु एक मिस्त्री व दो मजदूर लगा दिये गये । काम निरन्तर चलने लगा। मंदिर का कार्य धीरे-धीरे चल रहा था। इसी बीच 28 जून 1982 को मेरी शादी इलाहाबाद में हो गयी। शादी के बाद में पुनः खेड़ा मस्तान अपने नौकरी पर अकेले ही चला गया और नौकरी के साथ-साथ मंदिर निर्माण कार्य में पवू 'वत् बढ़ चढकर हिस्सा लेता रहा। चार–पाँच माह बाद दीपावली के अवकाश पर मैं पुनः अपने घर इलाहाबाद आया। अवकाश के उपरान्त जब वापस जाने लगा तो इस बार परिवार सहित गया और अपने साथ इलाहाबाद से हनुमान जी की एक मूर्ति मंदिर में स्थापित करने के लिए ले गया। मंदिर का कार्य पूर्ववत् चलता रहा । मूर्ति स्थापित करने से पवू' दिसम्बर 1982 में खेड़ा मस्तान के अतिरिक्त, क्षेत्र के अन्य पड़ोसी गाँवो मे विशाल जुलूस के साथ परिक्रमा की गयी । अब कार्य समापन की ओर था। अब तक मजदूर, मिस्त्री व ईंट, बालू सीमेंट वालों के लिए काफी पैसा उधार देना था। समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ से परा किया जाय परन्तु हनुमान जी पर पूरा विश्वास था । उनकी कृपा से जुलूस जब क्षेत्र से घूम कर पुनः मंदिर पर वापस आया तो इसी बीच एक व्यक्ति दिल्ली से आ गये। उनका नाम राम कुमार उर्फ रामे था। बताया गया कि उनके पूर्वज इसी गाँव के हैं। उन्होंने एक मुश्त चौदह सौ रूपये का दान मंदिर में मेरे पास दूर से भिजवा दिया और बिना मुझसे मिले वहाँ से चुपचाप चले गये । एक व्यक्ति द्वारा एक मुश्त दान देने वालों में यह सबसे अधिक दान था। इस धन को मिला लेने से सभी उधार चुकता कर लिया गया। उसके बाद उस महानुभाव को पुनः मंदिर पर बुलाने हेतु मैं प्रयास करता रहा। उनका कोई ठीक पता नहीं लग पाया। उनके जितने पते या दूरभाष के नम्बर बताये गये वह उस पर नहीं मिले। 25 वर्षों में अभी तक दोबारा न तो उनको ढूँढ पाया ओर न ही उनका दर्शन कर पाया। उन्होनं जुलूस के दौरान मेरे पास किसी से चौदह सौ रूपया भिजवा दिये थे। मेरा उनसे कोई परिचय भी नहीं हो पाया था । ग्राम खेड़ा मस्तान से 13 किमी दूर एक गाँव कुरालसी है । वहाँ के लोगों का मंदिर निर्माण मे अच्छा सहयोग रहा। कुरालसी मे श्री श्रीनिवास पुत्र श्री भीम सिंह, श्री हुकुम सिंह, श्री शेर सिंह नाम के तीन भगत जी थे। जिन्होंने अपने गाँव मे एक कीर्तन पार्टी बना रखी थी । वहाँ के एक महत्वपपू व्यक्ति श्री मंगू सिंह प्रधान जी के नाम से जाने जाते थे। वह हमारी समिति के डायरेक्टर भी थे। उनके सहयोग से कुरालसी गाँव की कीर्तन पार्टी समय-समय पर आती और रात्रि मे कीर्तन करती। कीर्तन में जो चढ़ावा आता उसको तथा अपनी पार्टी की तरफ से कुछ और दान मिलाकर सारा पैसा मंदिर में दे देते थे। इस प्रकार मंदिर निर्माण में उन लोगों का बहुत अच्छा सहयोग रहा। इस प्रकार धीरे-धीरे मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ता रहा और 31.01.1983 को मंदिर पूर्णरूप से तैयार हो गया । प्राण-प्रतिष्ठा का शुभ मुहूर्त पण्डितों से निकलवाया गया और चौदह पण्डितों द्वारा तीन दिन तक विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम चला। उसके बाद प्रतिदिन मंदिर में पूजा-पाठ व समय-समय पर रामचरित मानस का पाठ चलने लगा। आरती के समय गाँव के काफी लोग इकट्ठा होने लगे ।

इस प्रकार मंदिर निर्माण में उन दिनों श्रमदान व वस्तुदान के अतिरिक्त धीरे-धीरे कुल 71000 रूपय एकत्र हुआ था जिसे मंदिर निर्माण में प्रयोग किया गया। मंदिर निर्माण में आय-व्यय का रजिस्टर मंदिर में ही रख दिया गया ताकि अगर कोई दान दाता मंदिर का हिसाब लेना चाहे तो बिना किसी से पछूळे रजिस्टर में देखकर हिसाब की जानकारी कर सकता था। इस प्रकार एक वर्ष तक सामान्य रूप से कार्य चलता रहा। वर्ष 1984 मे पुनः धूमधाम से गाँव के लोगों से दान माँगकर वार्षिक उत्सव मनाया गया। इस उत्सव में मैंने हनुमान जी की प्रेरणा से तीनो दिन घी का दीपक जलाया और अपने स्थानान्तरण की प्रार्थना की क्योकि इस स्थान पर मुझे पाँच वर्ष से अधिक हो चुके थे। जून 1984 मे 100 प्रतिशत ऋण की वसूली करने के उपरान्त अवकाश लेकर इलाहाबाद आया। उन दिनों मेरे ससुर साहब रायबरेली में पुलिस विभाग मे तैनात थे तथा सपरिवार वहाँ रहते थे। जब मैं इलाहाबाद पहुँचा तो पता चला कि उसके एक दिन पहले गंगा गोमती एक्सप्रेस इलाहाबाद से लखनऊ के लिए चलना प्रारम्भ हुई थी । अगले दिन मैं गंगा गोमती से रायबरेली गया । इलाहाबाद के बाद पहला स्टाप रायबरेली ही पडतळा था । प्रातः 6 बजे गाड़ी छटूी और 8 बजे रायबरेली पहुँच गयी। मेरे मन में आया कि रायबरेली स्थानान्तरण हो जाये तो कितना अच्छा होता। इससे बढ़िया ट्रेन और क्या हो सकती थी । रायबरेली कुछ घण्टे रूकने के बाद मैं अपने आफिस मुख्यालय लखनऊ चला गया। वहाँ 4:30 बजे अपरान्ह पहुँचा। सम्बन्धित लिपिक वेद बाबू से सम्पर्क कर रायबरेली स्थानान्तरण के लिए अनुरोध किया। उसने दो टूक जवाब दिया कि स्थानान्तरण सचूी अनुमोदित हो चुकी है अब कुछ नहीं हो सकता। मैंने स्थानान्तरण के लिए न तो कभी प्रार्थना पत्र दिया था और न तो सम्बन्धित बाबू से ही मिला था। अगले वर्ष मार्च-अप्रैल मे मुझसे प्रार्थना पत्र के साथ आकर मिलियेगा तभी स्थानान्तरण सम्भव हो सकता है । अब स्थानान्तरण होने की कोई गुंजाइस नहीं है । अतएव मैं बहुत निराश हो गया। किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी के पास भी मेरी पहुँच नहीं थी । अतः खेड़ा मस्तान के हनुमान जी का स्मरण करते हुए गंगा गोमती एक्सप्रेस से इलाहाबाद लौट आया। अवकाश समाप्त होने पर मैं परिवार सहित पुनः खेड़ा मस्तान सर्विस करने चला गया। कार्यालय पहुँच कर देखा तो मेरे रायबरेली स्थानान्तरण का आदेश मेज पर रखा था । उसी दिन से खेड़ा मस्तान के हनुमान जी के प्रति मेरी अटूट श्रद्धा और भी बढ़ गयी। मैंने आनन-फानन तुरन्त रायबरेली जाने का मन बना लिया ।

जब खेड़ा मस्तान से कार्यमुक्त होकर चला तो मंदिर पर कार्य करने की जिम्मेदारी चौधरी जयपाल सिंह की सबसे छोटी पुत्री बब्ली (राकेश) को सौंपी। उन दिनों वह कक्षा तीन में पढ़ती थी । मेरे विदाई समारोह में गाँव वालों ने उसी मंदिर पर अखण्ड रामचरित मानस का पाठ व हवन करवाया। बैण्ड बाजा मँगवाकर लगभग डढे किमी तक चार–पाँच हजार लोग एक जुलूस बनाकर जिसमे (स्त्री, पुरूष, बच्चे, बढू, सभी सम्प्रदाय के लोग सम्मिलित थे) रोते बिलखते हुए मुझे तथा मेरी पत्नी को एक बुग्गी (भैंसा गाड़ी) पर बैठाकर गाँव की परिक्रमा कराते हुए फुगाना बस अड्डा तक बस में बैठाने के लिए साथ में आये । गाँव के लोगों के इस प्रेम को देखकर मैं अपने आप को रोक न सका। बस की प्रतिक्षा में जब मैं गाँव वालों के साथ बस के इतंजार में खड़ा था तो मेरे मुख से अनायास ही निकल पड़ा कि आप लोगो ने जो प्रेम दिया है उसके लिए मैं सदैव ऋणी रहूँगा । आज के बाद न तो मैं कभी यहाँ आऊँगा और न आप कभी इलाहाबाद आयेंगे। न जाने किस प्रेरणा से यह मंदिर बन गया। यदि इस मंदिर पर कुछ होता रहेगा तभी इस मंदिर का रखरखाव उचित प्रकार से हो पायेगा। गाँव खेड़ा मस्तान मे बाबा मस्तान शाह का एक मकबरा है, जिस पर प्रतिवर्ष तीन दिन का मेला आयोजित होता है । इस मेले के खर्च हेतु दूर-दूर से मुसलमान भाई चन्दा एकत्र करके भेजते हैं और प्रतिवर्ष मेला आयोजित होता है।

मैंने गाँव के लोगों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की उन्हीं तीन तिथियों में मेले का आयोजन किया जाये तो कैसा रहे? इस अवसर पर सभी लोग हनुमान जी के दरबार में एकत्रित हो, घी का दीपक जलायें उनका आशीर्वाद प्राप्त करे तथा आपस मे एक-दूसरे से वर्ष मे एक बार मुलाकात भी हो। सभी लोगो ने मेरे प्रस्ताव का समर्थन किया। परन्तु मेरे सामने एक शर्त रख दिया कि मेला तभी लगेगा जब आप स्वयं लगवायेंगे। हम लोग तो आपके पीछे रह कर केवल आपका साथ दे सकते है। मैंने अपनी असमर्थता व्यक्त किया। कहा कि इतनी दूर से हम मेला कैसे लगवा सकते हैं। तब उन लोगो ने कहा कि इसे फिर अपने दिमाग से निकाल दीजिए, यह कार्य असम्भव है। मैं चुप हो गया। उसी समय हनुमान जी की ऐसी प्रेरणा हुई कि मानों कोई कह रहा है कि मेला तो मुझे लगवाना है तुम चिन्ता क्यो करते हो, अपनी सहमति दो। मैंने अपनी सहमति दे दी। घोषणा किया कि अगले वर्ष से यहाँ तीन दिन का हनुमान मेला लगेगा। सभी ने तालियाँ बजाकर इसका समर्थन किया। कुछ देर के बाद बस आयी और हम लोग बस में बैठकर इलाहाबाद चले आये।

वहाँ से आने के बाद हर समय यही सोचता रहता था कि रायबरेली में रहकर खेड़ा मस्तान में मेला लगवाना कैसे सम्भव हो सकता है। धीरे-धीरे नवम्बर का महीना बीत गया। कोई तैयारी न देखकर मैं हिम्मत हार गया और निश्चय किया कि पत्र लिखकर सूचित कर दूँ कि मेला लगवाना मेरे लिए असम्भव है । उसके बाद से मेरे शरीर में रह-रह कर एक अजीब सी कम्पन्न होने लगी। मैं घबराया और परेशान हो गया । जब 8–10 दिन बीत गया और कम्पन्न ठीक नहीं हुआ तो एक रात जब मैं सोने के लिए बिस्तर पर लेटा तो सोचने लगा कि मेला न लगवाने का विचार मेरे मन में जो आया है शायद यह उसी का परिणाम है। अतः मैंने तय किया कि मेला लगवाने के लिए मना तो नहीं करूँगा जितना सम्भव हो सकेगा प्रयास करूँगा और मेला लगवाने के लिए वहाँ जरूर जाऊँगा। उसके बाद अगले दिन से शरीर में कम्पन्न आना बन्द हो गया। अगले दिन मैंने डाकखाने से सौ पोस्ट कार्ड खरीद कर लाया और खेड़ा मस्तान और आस-पास के गाँव के लोगों को पत्र लिखकर मेला की तिथि पर आने के लिए आग्रह करने लगा। धीरे-धीरे मेला से पवू' लगभग एक हजार पोस्ट कार्ड अपने हाथो से लिखकर डाला । नियत तिथि पर सब लोग हनुमान मंदिर पर एकत्र हुए और मेला लगना प्रारम्भ हुआ । इस मेले में एक चमत्कारिक घटना घटी जिसका वर्णन आगे किया गया है। हनुमान जी ने सदैव मिलाने का काम किया है। श्रीराम को सुग्रीव से मिलाया, सीता को राम से मिलाया । अतः हनुमान जी का यह दरबार हम सब लोगों के लिए मिलन - स्थल बना । जिसका नाम "विशाल हनुमान मेला” रखा गया। सामान्यतः यह मेला फरवरी माह मे पड़ता है।