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- श्री हनुमान मंदिर, ग्राम व पोस्ट - खेड़ा मस्तान , बुढाना- शामली रोड, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश - 247776
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मैं रामनाथ तिवारी जिला बाराबंकी उ० प्र० का रहने वाला हूँ तथा पेशे से जूनियर हाई स्कूल का प्रधानाचार्य हूँ। मेरे गले में कोई रोग मेरे लिए समस्या बन गया था जिससे साँस लेना, भोजन करना थूक निगलने आदि में अत्यंत कठिनाई होती थी और बहुत पीड़ा होती थी। कभी-कभी ऐसा महसूस होने लगता कि साँस बन्द होने वाली है। इस रोग का इलाज बाराबंकी तथा लखनऊ में कई अच्छे डॉक्टरों से कराया परन्तु रोग घटने के बजाय बढ़ता ही चला गया। मैं परेशान हो गया और महसूस करने लगा कि यह लाइलाज रोग है। अतः प्राण लेकर ही जायेगा। एक बार मैं बच्चों के साथ इलाज के लिए लखनऊ गया हुआ था। डॉक्टरों ने "दो-चार दिन के मेहमान हैं ऐसा कहकर बच्चों को वापस कर दिया। रात हो जाने के कारण बच्चे मुझे घर बाराबंकी लाने के बजाय लखनऊ में ही एक रिश्तेदार के यहाँ ले गये और रात भर रूककर सुबह जाने के लिए उनसे आग्रह किया। उन्होंने आग्रह स्वीकार किया और हम लोग वहाँ रात में रूक गये। वहाँ मुझे 27वाँ विशाल हनुमान मेला खेड़ा मस्तान जिला मुजफ्फर नगर उ० प्र० की स्मारिका का प्रथम अंक पढ़ने को मिली। स्मारिका में अंकित था कि खेड़ा मस्तान के हनुमान मेला में जो लोग जाते हैं और तीन दिन घी का दीपक जलाते हैं उनकी मनोकामना एक व में पूर्ण होती है। स्मारिका में कई लोगों के अनुभव भी प्रकाशित थे। मैंने पूरी स्मारिका को कई बार पढ़ा और अपने रिश्तेदार की अनुमति से स्मारिका को घर लेकर आ गया।
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मैंने सोचा अभी मेला लगने में काफी समय है। अतः मैंने स्मारिका में छपी खेड़ा मस्तान के हनुमान जी के स्वरूप को आधार मानकर उसके समक्ष घी का दीपक जलाकर हनुमान जी का ध्यान करके हनुमान चालीसा व हनुमान बाहुक का पाठ प्रतिदिन करने लगा। धीरे-धीरे मुझे लाभ मिलने लगा और 3-4 माह में मैं पूर्णरूप से ठीक हो गया। इस चमत्कार को देखकर मैं नहीं समझ पा रहा था कि खेड़ा मस्तान के हनुमान जी को कैसे आभार व्यक्त करूँ। बार-बार मेरे मन में इच्छा आने लगी कि कितनी जल्दी खेड़ा मस्तान जाकर हनुमान जी का दर्शन करूँ। मेला फरवरी में हैं और अभी सात माह बाकी है। मैं अपने को न रोक पाया और पत्नी के साथ खेड़ा मस्तान जाने के लिए जुलाई महीने में ही योजना बना ली। खेड़ा मस्तान मेरे लिए अजनबी जगह थी। वहाँ कैसे पहुँचा जाय इस पर विचार करने लगा। मैं स्मारिका में किसी ऐसे व्यक्ति को खोजने लगा जिसके माध्यम से खेड़ा मस्तान पहुँचा जा सके। अन्त में हमें सफलता मिल ही गयी। स्मारिका में इनुमान मेला के संस्थापक श्री रवि नारायण मिश्र, इलाहाबाद का फोन नं० मिल गया। मैंने मिश्रा जी से फोन पर सम्पर्क किया। मिश्रा जी बहुत भले लगे। फोन पर बात करते हुए ऐसा लगा जैसे हमारा उनका बहुत पुराना परिचय हो । उन्होंने मुझे सांत्वना देते हुए खेड़ा मस्तान का रास्ता बताया।
मैं जुलाई 2010 में ही पत्नी के साथ खेड़ा मस्तान के लिए निकल पड़ा। दूर बहुत है कैसे पहुँगा, कहाँ तीन दिन ठहरूंगा? वहाँ हमारा किसी से कोई जान- पहचान भी नहीं है आदि विचार रास्ते भर मन में आते रहे। लम्बी यात्रा के बाद अगले दिन जब मैं खेड़ा मस्तान गाँव के सामने बस से उतरा और वहाँ खड़े लोगों से खेड़ा मस्तान पहुँचने का रास्ता पूछने लगा तो पता चला कि गाँव एक किमी दूर है। वहाँ खड़े लोगों में हमारी मुलाकात सचिन शर्मा जी से हुई। उनसे खेड़ा मस्तान आने का उद्देश्य बताया तो वे अपने साथ हम लोगों को अपने बुग्गी (भैंसा गाड़ी) में बैठाकर गाँव ले गये। अपने घर रख तीन दिन हम लोगों का खूब सत्कार किया। मंदिर के सचिव राजेन्द्र सिंह मलिक से मुलाकात कराया। वे बहुत ही भले व्यक्ति हैं, उन्होंने हमें हनुमान जी का दर्शन कराया। मेरे साथ सुन्दर काण्ड आदि पढ़ने में सहयोग किया। मुझे तीन दिन वहाँ ऐसा लगा जैसे मृत्यु लोक से हटकर देव लोक पहुँच गया हूँ। गाँव वालों ने बताया कि यहाँ फरवरी में अर्थात् जिस दिन फाल्गुन लगता है उसके दूसरे दिन से तीन दिन तक के लिए बहुत बड़ा मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं।
अब मैं पूर्ण रूप से रोग मुक्त हूँ। समझ नहीं आ रहा है कि हनुमान जी के बाद सबसे पहले किसे धन्यवाद दूँ, अपने रिश्तेदार को जिन्होंने स्मारिका दिया या मेला के संस्थापक मिश्रा जी को जो इलाहाबाद में कहीं रहते हैं या फिर खेड़ा मस्तान के सचिन शर्मा को या फिर सचिव राजेन्द्र जी को । अभी तक मैं यही समझ पाया हूँ कि जो भक्त एक बार भी खेड़ा मस्तान के हनुमान जी का दर्शन कर लिया समझो उसका जीवन धन्य हो गया।
–पं0 राम नाथ तिवारी, ग्राम कटरा जिला बाराबंकी मो0-9721679032
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